Sunday, April 10, 2011

घर जाने की जल्दी जो नहीं है....

कुछ समय से दो शार्ट फ़िल्में बनाने में लगा हूँ । इस महीने के अंत तक काफी काम निपट जाएगा । आमतौर पर मैं अपने कार्यकर्मो की स्क्रिप्ट खुद ही लिखता हूँ लेकिन कुछ समय से एक स्क्रिप्ट राईटर मेरे साथ काम संभाल रहे हैं, बेहद शालीन और अनुभवी। शालीनता और अनुभव की तो मैं कह नहीं सकता लेकिन हम दोनों में एक बड़ी समानता ये है कि दोनों को ही घर जाने की जल्दी नहीं होती ।जहाँ शाम हुई वहीं रात गुजार लेते हैं।


पिछले दिनो एक लड़के ने मुझसे पूछा कि क्या अगले दो दिन में हम शूटिंग पूरी कर लेंगे ? मैने उसी शाम उसको विदा कर दिया। उसकी जल्दी की वजह ये थी कि उस युवा पत्रकार ने अपनी गर्लफ्रेंड से दो दिन बाद मिलने का वादा किया था ।बाद में महसूस हुआ की मुझे गुस्सा करने की जरुरत नहीं थी। मुझे किसी की ख़ुशी एक क्षण भी छिनने का अधिकार नहीं है । मैं सबको अपने जैसा ही क्यों मानने की गलती करूँ जब मुझे पता है की आदमी की कोई फोटो कापी नहीं होती ।


मेरे संजीदा दोस्तों मे से एक डा .अजीत विश्वविद्यालय में प्रवक्ता हैं । काबिल लेखक एवं कवि हैं लेकिन पारिवारिक दायित्व ज्यादा हैं । कभी- kabhi मुझसे कहते हैं कि आपकी जिन्दगी ठीक है,विवाह नाम की संस्था का हिस्सा बनेंते हैं तो मास्टरी करते रहो और शाम को बच्चों के ढूध का इंतजाम करते फिरो।


मेरे सहयोगी स्क्रिप्ट राईटर ने मुझसे कभी नहीं पूछा कि हम कितने दिन इस लोकेशन पर काम करेंगे और न जाने क्यों मैं भी उनसे कभी नहीं पूछ पाया कि आपको घर जाने की जल्दी तो नहीं है ?


शायद हम दोनों को ही इस बात का अंदाजा है कि इन सुहानी शामो में कोई नहीं है जो हमारे घर लौटने की राह देखता है .........










Saturday, January 29, 2011

लव आजकल

कैसा ये प्यार है
आजकल प्रेम का रंग बदल रहा है । कैसी अजीब सी बात है ,प्रेम का भी कोई रंग होता है भला । प्रेम पर लिखने वालों ने लिखा ' प्रेम खेत न निपजै प्रेम न हाट बिकाय ' । प्रेम तो मनुष्य का श्रेष्टतम गुण है जो अपने अलावा दूसरे की परवाह करना भी सिखाता है । प्रेम दीवानी मीरा ने कृष्ण के प्रेम में कहा 'ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन वो तो गली - गली हरि गुण गाने लगी '। प्रेम तो बस प्रेम है फिर क्यूँ सब कुछ अर्पण करने वाली परम्पराएं अब पुरानी सी पड़ने लगी हैं ।मशहूर शायर फैज़ ने लिखा है 'अब किसी लैला को भी इकरारे महबूबी नहीं कहता ,इन दिनों बदनाम है ऐसे दीवानों का नाम '। अब प्रेम का वजूद मिट रहा है । क्यूँ शायरों को ये कहने का मौका मिला कि वादे किए किसी से गुजारी किसी के साथ ।
पिछले दिनों देहरादून में एक उच्च शिक्षित व्यक्ति ने अपनी पत्नी का बेरहमी से क़त्ल कर लाश के टुकड़ों को फ्रीजर में छुपा दिया । दोनों ने लव मैरिज की थी जिसकी परिणति एक अपराध के रूप में हुई । इस अपराध की वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन ये कैसा प्यार था जो कभी उन दोनों के बीच हुआ था ।
कुछ दिन पहले दिल्ली में एक अय्याश कवि ने मुझसे कहा की बन्धु तुम्हारे जैसे लडकों की समझ से बाहर की बात है मारी वाली मोहब्बत मैंने पलट कर उनसे कहा 'आप वाली मोहबतों की ही फिल्मे बनती हैं जनाब ' उन महोदय ने मेरी बात का गलत अर्थ लगा लिया और नाराज होकर चले गए ।
व्यक्तिगत रूप से मेरा इस विषय में ज्यादा दखल नहीं है लेकिन बेगम अख्तर से लेकर नुसरत और आबिदा परवीन तक सबको सुना है । कुए की मुंडेरो पर बैठ कर न जाने कितनी नज्मे और बुल्लेशाह की हीर गाए हैं मैंने । मैंने बुजुर्गों से बटवारे के समय के किस्से भी खूब सुने है की जमीन के साथ कैसे लोगों की मोहब्बत भी तकसीम हुई ।
मैंने ये भी सुना है कि सब कुछ बदल रहा है लेकिन कभी -कभी सब पढ़ा बेकार चला जाता है और सब तर्क फेल हो जाते हैं जब कोई दिल के दरवाजे पर दस्तक देता है ।

Friday, January 28, 2011

विवाद में धर्मस्थली

पिछले महीने हिमाचल प्रदेश की यात्रा से वापसी हुई । धर्मशाला शहर में मुख्यमंत्री धूमल साहब से मुलाकात करने के बाद मैक्लोडगंज जाना चाहता था। सचिवालय से देरी से निकले तो कार्यक्रम नोरमलिंगा मठ जाने का बना।लद्दाख में सुनी ध्वनि 'ओम मणि पद्मे हूम ' नहीं सुन सका लेकिन मठ में फैली शांति का आकर्षण अब भी अनुभव करता हूँ । परसों शाम धर्मशाला स्थित मित्र ने बताया क़ि 'ऊना शहर में आटे क़ि बोरी में एक करोड़ रूपए के साथ दो लोग पकडे गए हैं। ऐसा माना जा रहा है क़ि ये पैसा करमापा लामा का है ।' आज सुबह ये खबर सुर्ख़ियों में है कि करमापा के यहाँ काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा बरामद हुई है । बरामद हुए पैसे में चीन क़ी करंसी भी है जो बेहद चिंता का विषय है। हो सकता है कोई बड़ी साजिश भी सामने आए । जाँच में जो निकलेगा वह सब जानेंगे लेकिन धर्मस्थली पर विपसना करने का ख्याल मुझे फिलहाल स्थगित करना पड़ेगा

Tuesday, January 11, 2011

ये है लिविंग होम

अभी हाल ही में ४१ वां अंतररास्ट्रीय फिल्मोत्सव गोवा में संपन्न हुआइस समारोह का एक मुख्य आकर्षण निर्देशक जयदीप की डाक्यूमेंट्री 'लिविंग होम' रही। 'लिविंग होम' को मिले सम्मान और मंच ने उन धारणाओं को तोड़ दिया जो डाक्यूमेंट्री फिल्मों की व्यूवरशिप को लेकर बनी हैंआमतौर पर ऐसा मान लिया जाता है कि डाक्यूमेंट्री फ़िल्में डिब्बे में बंद रखने के लिए ही बनाई जाती हैंथियेटर में रिलीज करने की बात करना तो और भी बड़ा मजाक माना जाता रहा ये जयदीप और उनके सहयोगियों की मेहनत का नतीजा है कि उनकी फिल्म पहली रिलीज डाक्यूमेंट्री बनी और देखने वालों ने इसे जी भर के सराहाअब कुछ पूर्वाग्रहों के चश्मे को उतारने और सत्य को देखने की जरुरत हैइससे पहले भी 'वार एंड पीस ' 'नाइन टू इलेवन' जैसी फिल्मों के जरिए ऐसे प्रयास हो चुके हैं........ उम्मीद है कि प्रयास और भी होंगे ...... कोई और भी हैं जो उस अँधेरे की चादर को चीरने का प्रयास करेंगे ...... जो उजाला होने नहीं देता .......

Friday, January 7, 2011

नूतन वर्ष की मंगल कामनाएँ

शुभकामनाएं
२१ वीं सदी का प्रथम दशक बड़ी जल्दी बीत गयानए दशक का आगाज एक नई आशा और विश्वाश के साथ हुआ हैहो सकता है की गुजरा वक्त आपको और मुझे कुछ कड़वी यादें दे गया हो या फिर कोई सुखद अहसास कि जिसके सहारे जिन्दगी गुजर जाएनई सुबह हर पुरानी सुबह की तरह ही होती है फिर भी किसी से मिलते समय गुड मार्निंग कहकर ही दिन की शुरुआत की जाती हैसमय बदलता है ,प्रकृति का नियम है लेकिन आज का दौर बड़े बदलाव का दौर हैये कुछ समय पहले की ही तो बात है जब सदी कि शुरुआत हुई थीदस साल कितनी तेजी के साथ बीत गएऐसे ही बदल जाता है बहुत कुछ ....रिश्ते, नाते , दोस्ती, विश्वास ..... सब कुछहमारा अपना देश भी बड़े बदलाव के दौर में हैदुनिया का हर तीसरा निरक्षर व्यक्ति भारत में रहता है और हम उसी दुनिया के आगे महाशक्ति होने का दम भरते हैंदेखिए, लोगों का चेहरा और चरित्र सब कुछ बदल रहा हैजिस देश में कलमाड़ी जैसे खिलाडी ,टाटा और नीरा राडिया जैसे बड़े लोग रहते हों ऐसे देश में सब कुछ तेजी के साथ ही तो बदलता है

हो रहा भारत निर्माण ....
आपने
टीवी पर वो विज्ञापन तो देखा ही होगा जिसमे एक गाने और सुन्दर विजुअल के साथ संपूर्ण भारत के दर्शन होते हैवह जिंगल है , हो रहा भारत निर्माण .... हो रहा भारत निर्माणहम जैसे नौजवानों को ही ये दायित्व दिया गया है कि भारत कि जनता को चाहते हुए भी ऐसे दर्शन कराओआइये एक बानगी देखिए ...... मैं राजस्थान के सीकर जिले में अपने एक दोस्त के साथ सफ़र में थासड़क किनारे एक छोटी पहाड़ी पर प्राची मंदिर देख कर थोड़ी देर के लिए रुक गएजब मंदिर से चलने लगे तो कुछ बच्चे हमसे पैसे कि मांग करने लगेमैंने बच्चों से कहा कि मैं आपको कुछ खाने को दे सकता हूँ लेकिन पैसे नहीं दूंगाबात का सिलसला चला तो पता लगा कि वो बच्चे मंदिर दर्शन को आने वाले हर राहगीर से पैसे की मांग करते हैंएक बच्चा जो छठी कक्षा का छात्र था , उससे मैंने पूछा बेटे! हमारे देश के प्रधान मंत्री कौन हैं' ? तो बच्चे का बिना लागलपेट उत्तर था .... ' वीरू '
सेंट कोलंबस में पढ़ने वाले उस उम्र के बच्चे से व्हाइट हॉउस के बारे में बात करें तो वहां कि गतिविधियों और मोनिका लेवेंस्की के बारे में सब जानकारी आपको मिल जाएगी . यही बदलाव का दौर है

शिक्षा का अधिकार
आजादी
के बाद सविंधान लिखने वालों ने भारत की जनता से ये वादा किया था कि दस वर्षों के दौरान हर अमी गरीब बच्चे को बिना किसी भेदभाव निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जाएगीआजादी के ६३ साल बीत जाने के बाद शिक्षा का अधिकार अधिनियम -२००९ अब लागू हुआ हैक्या ये अधिनियम भी आर टी आई की तरह किर्यान्वित और प्रभावी हो सकेगा ? मुझे अक्सर ऐसी बातें परेशान करती हैं और राजस्थान के गाँव का वह बच्चा याद आता है .

मेरा ब्लॉग म्हारा हरियाणा
मेरी आदत कलम से लिखने की रही है इसलिए कंप्यूटर पर जरूरी काम ही करता हूँलत है कि ज़नाब छूटती ही नहीं..... । नववर्ष की पूर्व संध्या पर काफी कुछ लिखा लेकिन तकनीकी खराबी की वजह से सब मिट गया.... फिर से लिखने का साहस नहीं कर पायागत वर्ष एक समाचार- पत्र के मुख्य पृष्ट पर म्हारा हरियाणा ब्लॉग से स्टोरी की शुरुआत की गई थीपत्रकार मित्र को धन्यवाद
और अंत में .. पिछले वर्ष क्या हमने अपना हाथ किसी की मदद के लिए आगे बढाया था ?
यदि नहीं,तो अब बढाएँगे.
यदि
हाँ, तो ख़ुशी कितनी मिली थी उसका हिसाब लगा लीजिए
कुछ कड़वी यादें हो तो डिलीट कर दीजिए पुरानी फाईलों की तरह और एक भी याद सुनहरी हो तो ..... सुना है लोग उम्रें गुजर देते हैं ...........।
पुन:शुभकामनाएँ

Friday, October 15, 2010

हार और जीत का खेल





कल शाम १९ वें कॉमनवेल्थ खेलों का समापन हुआ !जिस तरह खेलों का शानदार आगाज हुआ उसी तरह कलमाडी जैसे खिलाडी इसे भव्य अंजाम तक भी ले गए ! इन खेलों में भारत का जलवा दुनिया ने देखा ! उम्मीद से ज्यादा सोना भारत की झोली मे आया और हरियाणा के धुरंधरों ने इतिहास रचा !हरियाणा में ख़ुशी की लहर रही, ख़ुशी स्वाभाविक थी क्योंकि ये प्रदेश की गौरव -गाथा लिखने वाले खिलाडियों की उपलब्धि थी !हुड्डा साहब ने अपने किसी चहेते को बुलाकर इंटरव्यू दिया कि " ये हमारी खेल नीति का परिणाम है' चौटाला का बयान आया कि "कांग्रेस हमारे बोये क़ी फसल काट रही है" ! खिलाडियों के लिए बधाई घर जाकर दी जाने लगी !कुछ वीआई पी लोगों ने फैलेक्शी चुम्बन भी भेजे ! घोषणा हुई कि हरियाणा आने पर इन वीर सपूतों को जेब खोल कर धन और दिल खोलकर कर सम्मान दिया जायेगा !अगले दो एक दिन में कोई भव्य समारोह भी किसी राजनैतिक शहर मे देखने को मिले .......
जब कॉमनवेल्थ की जयगाथा लिखी जा रही थी तब छत्तीसगढ़ मे एक नक्सली हमले मे हरियाणा के दो जवान जिन्दगी की जंग हार गए ! सरकार ने मरने वाले जवानों के परिवार को एक लाख रुपये देने कि घोषणा की है ! खेल जीतने वालों के लिए तो नीति सरकार ने बना दी है जिन्दगी क़ी जंग हारने के लिए भी कोई नीति है..... नंबर वन हरियाणा क़ी सरकार के पास ...... है कोई नुस्खा जो उनके जख्मों पर मरहम लगा सके जहाँ एक बूढी माँ और एक विधवा बहू दरवाजे पर आँखों में आंसू लिए खडी है ................

Wednesday, September 15, 2010

चर्चा जारी है ....

हम जूते पर चर्चा कर रहे थे !जूते पर सबसे ज्यादा जूतम -पैजार हुई जब ये जार्ज बुश पर पड़ा !किसी शरीफ आदमी पर जूता पड़े तो और बात है ,दुनिया का सबसे बड़ा दादा देश जो कहता है कि वह जो भी करे सब ठीक है उस स्वयंभू रास्ट्र का राष्ट्रपति जार्ज बुश ! जिसने अपने बाप का हुकम न मानने वाले सद्दाम और इराक को मिटटी में मिला दिया !ऐसे मुखिया पर जूता पड़े और हल्ला न हो,ये कैसे हो सकता है ! कुछ समय बाद हमारे यहाँ एक प्रेस वार्ता में सिख पत्रकार द्वारा जूता फेंका गया !अब जूतों कि गिनती होने लगी कि ये कौनसा (कितनी बार) पड़ा है !आजकल मुन्नी जिस कदर बदनाम हुई है वैसे ही बदनाम हुआ है ये जूता !ज्यादा चले तो बदनाम न चले तो बदनाम पत्रकार जरनैल सिंह द्वारा जूता फेंकने की वजह माना गया सिख विरोधी दंगों के दोषियों पर उचित कार्रवाई नही किए जाना ! आपरेशन ब्लूस्टार करीब ६० घंटे चले इस सैन्य अभियान में भिंडरावाले के नेतृत्व में लड़ रहे लड़ाकों का सफाया किया गया !स्वर्णमंदिर में चले इस अभियान में १००० आतंकवादी और २०० सैनिक मारे गए !लेकिन इसके ५ महीने बाद ही इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी गई !गाँधी की मृत्यु के साथ ही एक युग का अंत हो गया !इसके बाद सिक्ख विरोधी दंगों में हजारों लोगों की जाने गई !लगभग ३००० लोग दिल्ली के दंगों में मारे गए और १५०० सिक्खों ने शिविरों में शरण ली !इसका नतीजा ये निकला खालीस्तान आन्दोलन को बढ़ावा मिला और इसके कुचले जाने तक लगभग २५००० जाने गई !

Friday, September 3, 2010

ये जूता किस कम्पनी का है

जूता चाहे कैसा सा भी हो , पैर मे पहनने के ही काम आता है! परन्तु अब जूता, विरोध जताने के नए तरीके के रूप मे विकसित हुआ है ! हाल ही मे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की सम्मान रैली मे मंच पर जूता फैका गया ! इतना होना था कि साथी मीडियाकर्मियों के फोन आने शुरू हुए , सभी को जरुरत थी जूते के दुर्लभ विजुअल की! इधर -उधर फोन करने पर भी जब विजुअल की बात नहीं बनी तो मित्रों का आग्रह था कि इतना तो पता कर ही सकते हैं कि जूता किस कम्पनी का है! इधर खोजबीन करने पर सामने आया कि रोहतक जिले के गाँव बनियानी के शक्ति सिंह ने जूता फेंककर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है ! इस पूरे प्रकरण में जहाँ शक्ति सिंह कि सरकार के प्रति अपनी नाराजगी थी वहीँ राजपूत सभा का भी इशारा रहा ! आक्रोश जताने का अपना एक तरीका होता है , लेकिन मैं जब भी भूपेंदर सिंह हुड्डा से मिला हूँ तो वे शांत और गंभीर नज़र आये है ! जब प्रदेश के विकास कि बात शुरू होती है तो वे ये भूल जाते है कि साक्षात्कार करने के लिए समय कितना निश्चित हुआ है! शक्ति सिंह को दिए गए आश्वासन बेशक पूरे न हुए हों , राजपूत सभा कि सरकार के प्रति राजनैतिक नाराजगी रही हो लेकिन मुझे नहीं लगता कि हरियाणा में ऐसी तानाशाह सरकार है कि युवाओं को राजनैतिक मंचों पर जूते फैक कर अपना विरोध दर्ज कराना पड़े ..........................! जूते पर चर्चा जारी है .......................................

Saturday, September 5, 2009

लम्हों की खता सदियों की सज़ा

पिछले दिनों अमरनाथ की यात्रा के बाद लगातार शिमला और देहरादून की यात्रा पर रहा।

पहले कश्मीर की बात

बाबा अमरनाथ के दर्शन करने की सनक थी इसलिए बालताल से शुभ मुहूर्त में पैदल निकल पड़ा . बाबा बर्फानी के परम भक्त कबूतरों से मिलने की इच्छा में ये भी ख्याल न रहा कि सुबह पहले रास्ते में कोई जयकारा बोलने वाला भी नहीं मिलेगा . राह कठिन थी और शरीर साथ नहीं दे रहा था ,काफी ऊँची चढाई से उतरते समय एक राहगीर मिला जिसके कंधे पर लकड़ी के कुछ तख्तों का गठ्टर था। जब मैंने उससे पूछा 'बाबा आप इतनी ऊंचाई पर ये सामान लेकर कैसे चढेंगे? वह छोटा सा उत्तर देकर आगे बढ़ गया, 'क्या करें करना पड़ता है' ।

अब बात शिमला की

मुझे रिज जाना था,लिफ्ट के रास्ते पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था । एक बूढा आदमी दो पोर्टेबल टीवी कंधे पर बांधे मेरे आगे-आगे चल रहा था। मैं उस बूढे व्यक्ति से कुछ भी पूछने का साहस नहीं कर पाया । मुझे पता था , मै जो पूछूंगा उसका जवाब क्या मिलेगा ।

आज फ़िर मुझे अमरनाथ यात्रा मे मिला वह तख्ते वाला बाबा याद आ रहा था।

मै अब अक्सर अपनी अमरनाथ यात्रा के बारे में सोचता हूँ ,कश्मीर और शिमला घूमने वाले सैलानियों के बारे में सोचता हूँ .......... और सोचता हूँ ,देश में न जाने कितने ऐसे बाबा होंगे जिनके कंधे झुक गए हैं लेकिन कमबख्त बोझ है कि कम होने का नाम नहीं लेता .........

Saturday, July 11, 2009

अपनों से अपनी बात

मित्रो!


आज बहुत दिनों बाद आप से मिलना मुनासिब हुआ है। ब्लॉग बना देने से मैं इसलिए भी बचता रहा हूँ कि अक्सर ऐसा होता है कि क्षणिक उत्तेजना में ब्लॉग का सृजन तो हो जाता है लेकिन नियमित लेखन होना थोडा मुश्किल होता है।खैर !हिंदी के ब्लॉग जगत में भले ही म्हारा हरियाणा अभी शिशु ही है लेकिन अपना प्रयास रहेगा कि संवाद में संवेदना बनी रहे. ग्रामीण भारत के उन पहलुओ से आपको रूबरू करवाया जा सके जो अब तक हाशिये पर है। इस ब्लॉग के कंटेंट को लेकर भी कोई खास किस्म का नियोजन नहीं किया गया है . बस प्रयास किया जाएगा कि आपको यहाँ एक अपनेपन का एहसास हो॥अब कुछ अपनी बात...... मेरे जैसे और भी बहुत से देहात से आये लोगो कि ये स्थाई पीडा रही है कि अपनी पेशेवर जगत में खुद को अपने मौलिक रूप से बचाए रखना बड़ा काम है,जब मैं घर से निकला था तब कोरा भावुक मन था, जैसा खुद महसूस करता था वैसी ही दुनिया को भी समझता है लेकिन ज्यों-ज्यों इस दुनियादारी से साबका होता गया मौलिक मान्यताएं भी बदली है..भाषा,क्षेत्र,जाति को लेकर इस तथाकथित बुधिजिवी वर्ग में इतने पूर्वाग्रह देखने को मिले कि कभी- कभी मन बड़ा खिन्न हो जाता था. एक बहुत बड़े वर्ग का ये मानना रहा है कि हरियाणा, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग पढने लिखने में कैसे माहिर हो सकते है? पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाषा का पांडित्य उनके पिछडेपन को कभी जाहिर नहीं होने देता था और वर्ग विशेष कि स्वयं श्रेष्टतावादी सोच सभी से जग जाहिर है. बुधिजिवियो के व्यंगबाण हमे भी तोड़ देते अगर एक जिद्दी धुन न होती खुद की शर्तो पर जीने की............ बस यही एक प्रेरणा का साधन रही है. भारतीय समाज के सबसे बड़े मीडिया माध्यम हिंदी फिल्मो ने हरियाणा की समृद्ध लोक संस्कृति को फूहड़ हास्य की विषयवस्तु बनाया है। यहाँ की बोली का एक ठेठपन अपनी मौलिकता की छाप छोड़ने के बजाय सस्ता हास्य बन कर रह गयी है . बाजार ने इसके मर्म पर चोट की है और अफ़सोस बस यही है कि इस प्रगतिशील समाज में ऐसे बौद्धिक रचनात्मक फिल्मकारों को कभी इसका एहसास नहीं होगा कि वो समाज को एक समृद्ध लोक संस्कृति की क्या तस्वीर दिखा रहे है? ऐसे ही कुछ ग्रामीण लोक संस्कृति, साहित्य,बोली,भाषा,लोक प्रतिभा और ग्रामीण समाज के विमर्श का मंच बनाया जाएगा म्हारा हरियाणा को...


अंत में एक निवेदन और है आप सभी से कि म्हारा हरियाणा को कदाचित भी क्षेत्रवाद से जोड़ के न देखा जाए . ये सम्पूर्ण भारतीय ग्रामीण समाज की लोक चेतना का मंच है और हरियाणा कि मिट्टी तो बस इसकी निमित्त मात्र है!


अभी बस इतना ही अगली पोस्ट में एक नए तेवर और कलेवर के साथ मुलाकात होगी...


आपका अपना


डॉ.कृष्ण कुमार


Saturday, June 20, 2009

म्हारा हरियाणा

डॉ.कृष्ण कुमार :
हरियाणा में महेन्द्रगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव से निकलकर दर्शन शास्त्र में पी-एच. डी। पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद कुछ समय दूरदर्शन और इंडिया टी.वी. में कार्य किया, अब टी.वी. कार्यक्रम निमार्ण में सक्रिय। विकास की एक नयी इबारत देशोस्ति हरियानाख्याम: पृथ्वीयां स्वर्ग सन्निभः
हरियाणा नाम का एक देश है जो पृथ्वी पर स्वर्ग के समान है। ये पंक्तियां एक पुरातन लेख से ली गई हैं और आधुनिक हरियाणा के विकास की रंगोली ने इन्हें पुनः रंगीन कर दिया है।
म्हारा हरियाणा : मिट्टी की सुगंध
हरियाणा में प्रचलित‘‘बम लहरी’’ की खनक सरहदों के पार महसूस की जाए, शादी-ब्याह में बाजे बजें और फसल कटे तो सारंगी। यो सै 'म्हारा हरियाणा' लगभग दो वर्ष पहले दूरदर्शन के लिएम्हारा हरियाणाकार्यक्रम बनाना शुरू किया। कार्यक्रम की शूटिंग के दौरान लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया। इसी बहाने उनके दुःख दर्द और समस्याओं को जानने का अवसर मिला। हम दर्द की दवा नहीं बेचते लेकिन कोशिश है कि वंचित लोग ज्यादा से ज्यादा जागरूक हों जिससे उनके अधिकारों की बहाली हो सके। जब कार्यक्रम बनाने शुरू किए तब कुछ शुभचिंतकों ने ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित कार्यक्रमों की सफलता पर सन्देह जाहिर किया था।मेरा उद्देश्य आंशिक रूप से ही उसी दिन पूरा हो गया जब सातवीं कक्षा में पढने वाली एक गाडिया लुहार बच्ची ने परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल करने पर अपने डेरे पर आमन्त्रित किया। कुछ समय पहले उस बच्ची के अभिभावकों को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए प्रोत्साहित किया था।ऐसे लोग जिनको जीवन का हर दिन संघर्ष की इबारत से शुरू होता है उनके लिए कार्यक्रम में पहले से ही काफी जगह हमने निश्चित कर दी थी। दिल्ली की मंडी में हौसले गिराकर हिम्मत रखने की बात करने वालों को हमने नजदीक से देखा है। फिर भी दुनिया के असली मायने आखिर तक समझ में नहीं आते।
मन लागा यार फकीरी में किस्मत हाथों की लकीरों में ठुकरा दे जमाने को, बैठ फकीरी में
हमारे प्रयासों की झलक आपको मिलती रहेगी। अपने अनुभवों को हम आपसे साँझा करते रहेगे अगर आप चाहें ..... बड़े शायर की इन पंक्तियों के साथ ...

अगर फुर्सत मिले
पानी की तहरीरों को पढ लेना, हर एक दरिया हजारों साल अफसाना सा लगता है। शेष फ़िर... आपका अपना डॉ.कृष्ण कुमार