Sunday, April 10, 2011
घर जाने की जल्दी जो नहीं है....
Saturday, January 29, 2011
लव आजकल
आजकल प्रेम का रंग बदल रहा है । कैसी अजीब सी बात है ,प्रेम का भी कोई रंग होता है भला । प्रेम पर लिखने वालों ने लिखा ' प्रेम खेत न निपजै प्रेम न हाट बिकाय ' । प्रेम तो मनुष्य का श्रेष्टतम गुण है जो अपने अलावा दूसरे की परवाह करना भी सिखाता है । प्रेम दीवानी मीरा ने कृष्ण के प्रेम में कहा 'ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन वो तो गली - गली हरि गुण गाने लगी '। प्रेम तो बस प्रेम है फिर क्यूँ सब कुछ अर्पण करने वाली परम्पराएं अब पुरानी सी पड़ने लगी हैं ।मशहूर शायर फैज़ ने लिखा है 'अब किसी लैला को भी इकरारे महबूबी नहीं कहता ,इन दिनों बदनाम है ऐसे दीवानों का नाम '। अब प्रेम का वजूद मिट रहा है । क्यूँ शायरों को ये कहने का मौका मिला कि वादे किए किसी से गुजारी किसी के साथ ।
पिछले दिनों देहरादून में एक उच्च शिक्षित व्यक्ति ने अपनी पत्नी का बेरहमी से क़त्ल कर लाश के टुकड़ों को फ्रीजर में छुपा दिया । दोनों ने लव मैरिज की थी जिसकी परिणति एक अपराध के रूप में हुई । इस अपराध की वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन ये कैसा प्यार था जो कभी उन दोनों के बीच हुआ था ।
कुछ दिन पहले दिल्ली में एक अय्याश कवि ने मुझसे कहा की बन्धु तुम्हारे जैसे लडकों की समझ से बाहर की बात है हमारी वाली मोहब्बत । मैंने पलट कर उनसे कहा 'आप वाली मोहबतों की ही फिल्मे बनती हैं जनाब ' उन महोदय ने मेरी बात का गलत अर्थ लगा लिया और नाराज होकर चले गए ।
व्यक्तिगत रूप से मेरा इस विषय में ज्यादा दखल नहीं है लेकिन बेगम अख्तर से लेकर नुसरत और आबिदा परवीन तक सबको सुना है । कुए की मुंडेरो पर बैठ कर न जाने कितनी नज्मे और बुल्लेशाह की हीर गाए हैं मैंने । मैंने बुजुर्गों से बटवारे के समय के किस्से भी खूब सुने है की जमीन के साथ कैसे लोगों की मोहब्बत भी तकसीम हुई ।
मैंने ये भी सुना है कि सब कुछ बदल रहा है लेकिन कभी -कभी सब पढ़ा बेकार चला जाता है और सब तर्क फेल हो जाते हैं जब कोई दिल के दरवाजे पर दस्तक देता है ।
Friday, January 28, 2011
विवाद में धर्मस्थली
Tuesday, January 11, 2011
ये है लिविंग होम
Friday, January 7, 2011
नूतन वर्ष की मंगल कामनाएँ
२१ वीं सदी का प्रथम दशक बड़ी जल्दी बीत गया । नए दशक का आगाज एक नई आशा और विश्वाश के साथ हुआ है । हो सकता है की गुजरा वक्त आपको और मुझे कुछ कड़वी यादें दे गया हो या फिर कोई सुखद अहसास कि जिसके सहारे जिन्दगी गुजर जाए । नई सुबह हर पुरानी सुबह की तरह ही होती है फिर भी किसी से मिलते समय गुड मार्निंग कहकर ही दिन की शुरुआत की जाती है । समय बदलता है ,प्रकृति का नियम है लेकिन आज का दौर बड़े बदलाव का दौर है । ये कुछ समय पहले की ही तो बात है जब सदी कि शुरुआत हुई थी । दस साल कितनी तेजी के साथ बीत गए । ऐसे ही बदल जाता है बहुत कुछ ....रिश्ते, नाते , दोस्ती, विश्वास ..... सब कुछ । हमारा अपना देश भी बड़े बदलाव के दौर में है । दुनिया का हर तीसरा निरक्षर व्यक्ति भारत में रहता है और हम उसी दुनिया के आगे महाशक्ति होने का दम भरते हैं । देखिए, लोगों का चेहरा और चरित्र सब कुछ बदल रहा है । जिस देश में कलमाड़ी जैसे खिलाडी ,टाटा और नीरा राडिया जैसे बड़े लोग रहते हों ऐसे देश में सब कुछ तेजी के साथ ही तो बदलता है ।
हो रहा भारत निर्माण ....
आपने टीवी पर वो विज्ञापन तो देखा ही होगा जिसमे एक गाने और सुन्दर विजुअल के साथ संपूर्ण भारत के दर्शन होते है । वह जिंगल है , हो रहा भारत निर्माण .... हो रहा भारत निर्माण । हम जैसे नौजवानों को ही ये दायित्व दिया गया है कि भारत कि जनता को न चाहते हुए भी ऐसे दर्शन कराओ । आइये एक बानगी देखिए ...... मैं राजस्थान के सीकर जिले में अपने एक दोस्त के साथ सफ़र में था । सड़क किनारे एक छोटी पहाड़ी पर प्राचीन मंदिर देख कर थोड़ी देर के लिए रुक गए । जब मंदिर से चलने लगे तो कुछ बच्चे हमसे पैसे कि मांग करने लगे। मैंने बच्चों से कहा कि मैं आपको कुछ खाने को दे सकता हूँ लेकिन पैसे नहीं दूंगा । बात का सिलसला चला तो पता लगा कि वो बच्चे मंदिर दर्शन को आने वाले हर राहगीर से पैसे की मांग करते हैं। एक बच्चा जो छठी कक्षा का छात्र था , उससे मैंने पूछा बेटे! हमारे देश के प्रधान मंत्री कौन हैं' ? तो बच्चे का बिना लागलपेट उत्तर था .... ' वीरू ' ।
शिक्षा का अधिकार
आजादी के बाद सविंधान लिखने वालों ने भारत की जनता से ये वादा किया था कि दस वर्षों के दौरान हर अमीर गरीब बच्चे को बिना किसी भेदभाव निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जाएगी । आजादी के ६३ साल बीत जाने के बाद शिक्षा का अधिकार अधिनियम -२००९ अब लागू हुआ है । क्या ये अधिनियम भी आर टी आई की तरह किर्यान्वित और प्रभावी हो सकेगा ? मुझे अक्सर ऐसी बातें परेशान करती हैं और राजस्थान के गाँव का वह बच्चा याद आता है .
मेरा ब्लॉग म्हारा हरियाणा
मेरी आदत कलम से लिखने की रही है इसलिए कंप्यूटर पर जरूरी काम ही करता हूँ । लत है कि ज़नाब छूटती ही नहीं..... । नववर्ष की पूर्व संध्या पर काफी कुछ लिखा लेकिन तकनीकी खराबी की वजह से सब मिट गया.... फिर से लिखने का साहस नहीं कर पाया । गत वर्ष एक समाचार- पत्र के मुख्य पृष्ट पर म्हारा हरियाणा ब्लॉग से स्टोरी की शुरुआत की गई थी । पत्रकार मित्र को धन्यवाद ।
और अंत में .. पिछले वर्ष क्या हमने अपना हाथ किसी की मदद के लिए आगे बढाया था ?
यदि नहीं,तो अब बढाएँगे.
यदि हाँ, तो ख़ुशी कितनी मिली थी उसका हिसाब लगा लीजिए ।
पुन:शुभकामनाएँ
Friday, October 15, 2010
हार और जीत का खेल


जब कॉमनवेल्थ की जयगाथा लिखी जा रही थी तब छत्तीसगढ़ मे एक नक्सली हमले मे हरियाणा के दो जवान जिन्दगी की जंग हार गए ! सरकार ने मरने वाले जवानों के परिवार को एक लाख रुपये देने कि घोषणा की है ! खेल जीतने वालों के लिए तो नीति सरकार ने बना दी है जिन्दगी क़ी जंग हारने के लिए भी कोई नीति है..... नंबर वन हरियाणा क़ी सरकार के पास ...... है कोई नुस्खा जो उनके जख्मों पर मरहम लगा सके जहाँ एक बूढी माँ और एक विधवा बहू दरवाजे पर आँखों में आंसू लिए खडी है ................
Wednesday, September 15, 2010
चर्चा जारी है ....
Friday, September 3, 2010
ये जूता किस कम्पनी का है
Saturday, September 5, 2009
Saturday, July 11, 2009
अपनों से अपनी बात
मित्रो!
आज बहुत दिनों बाद आप से मिलना मुनासिब हुआ है। ब्लॉग बना देने से मैं इसलिए भी बचता रहा हूँ कि अक्सर ऐसा होता है कि क्षणिक उत्तेजना में ब्लॉग का सृजन तो हो जाता है लेकिन नियमित लेखन होना थोडा मुश्किल होता है।खैर !हिंदी के ब्लॉग जगत में भले ही म्हारा हरियाणा अभी शिशु ही है लेकिन अपना प्रयास रहेगा कि संवाद में संवेदना बनी रहे. ग्रामीण भारत के उन पहलुओ से आपको रूबरू करवाया जा सके जो अब तक हाशिये पर है। इस ब्लॉग के कंटेंट को लेकर भी कोई खास किस्म का नियोजन नहीं किया गया है . बस प्रयास किया जाएगा कि आपको यहाँ एक अपनेपन का एहसास हो॥अब कुछ अपनी बात...... मेरे जैसे और भी बहुत से देहात से आये लोगो कि ये स्थाई पीडा रही है कि अपनी पेशेवर जगत में खुद को अपने मौलिक रूप से बचाए रखना बड़ा काम है,जब मैं घर से निकला था तब कोरा भावुक मन था, जैसा खुद महसूस करता था वैसी ही दुनिया को भी समझता है लेकिन ज्यों-ज्यों इस दुनियादारी से साबका होता गया मौलिक मान्यताएं भी बदली है..भाषा,क्षेत्र,जाति को लेकर इस तथाकथित बुधिजिवी वर्ग में इतने पूर्वाग्रह देखने को मिले कि कभी- कभी मन बड़ा खिन्न हो जाता था. एक बहुत बड़े वर्ग का ये मानना रहा है कि हरियाणा, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग पढने लिखने में कैसे माहिर हो सकते है? पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाषा का पांडित्य उनके पिछडेपन को कभी जाहिर नहीं होने देता था और वर्ग विशेष कि स्वयं श्रेष्टतावादी सोच सभी से जग जाहिर है. बुधिजिवियो के व्यंगबाण हमे भी तोड़ देते अगर एक जिद्दी धुन न होती खुद की शर्तो पर जीने की............ बस यही एक प्रेरणा का साधन रही है. भारतीय समाज के सबसे बड़े मीडिया माध्यम हिंदी फिल्मो ने हरियाणा की समृद्ध लोक संस्कृति को फूहड़ हास्य की विषयवस्तु बनाया है। यहाँ की बोली का एक ठेठपन अपनी मौलिकता की छाप छोड़ने के बजाय सस्ता हास्य बन कर रह गयी है . बाजार ने इसके मर्म पर चोट की है और अफ़सोस बस यही है कि इस प्रगतिशील समाज में ऐसे बौद्धिक रचनात्मक फिल्मकारों को कभी इसका एहसास नहीं होगा कि वो समाज को एक समृद्ध लोक संस्कृति की क्या तस्वीर दिखा रहे है? ऐसे ही कुछ ग्रामीण लोक संस्कृति, साहित्य,बोली,भाषा,लोक प्रतिभा और ग्रामीण समाज के विमर्श का मंच बनाया जाएगा म्हारा हरियाणा को...
अंत में एक निवेदन और है आप सभी से कि म्हारा हरियाणा को कदाचित भी क्षेत्रवाद से जोड़ के न देखा जाए . ये सम्पूर्ण भारतीय ग्रामीण समाज की लोक चेतना का मंच है और हरियाणा कि मिट्टी तो बस इसकी निमित्त मात्र है!
अभी बस इतना ही अगली पोस्ट में एक नए तेवर और कलेवर के साथ मुलाकात होगी...
आपका अपना
डॉ.कृष्ण कुमार
Saturday, June 20, 2009
म्हारा हरियाणा
डॉ.कृष्ण कुमार :
म्हारा हरियाणा : मिट्टी की सुगंध